नमाज़ इस्लाम की सबसे नज़दीकी इबादत है — दिन में पाँच बार अल्लाह से मिलने का वक़्त। भारत में उर्दू, हिंदी और स्थानीय भाषाओं में «नमाज़» कहा जाता है; अरबी में «सलाह»। तरीक़ा एक ही है, चाहे आप दिल्ली की जामा मस्जिद में हों या मुंबई की मोहल्ला मस्जिद में।
शुरुआत: वुज़ू और नीयत
नमाज़ से पहले वुज़ू ज़रूरी है — पाक सफ़ाई। फिर क़िबला की ओर मुँह करके नीयत करें: कौन-सी नमाज़, कितनी रकअत। नीयत दिल में होती है, ज़बान से कहना ज़रूरी नहीं।
एक रकअत का तरीक़ा
- तकबीर: «अल्लाहु अकबर» — हाथ कानों तक
- क़िराअत: सूरह फ़ातिहा और कोई सूरह
- रुकू: «सुब्हाना रब्बियal अज़ीम» — तीन बार
- सजदे: «सुब्हाना रब्बियal अला» — तीन बार, दो सजदे
- बैठकर तशह्हुद, फिर सलाम
पाँच वक़्त की रकअत
- फ़ज्र: 2 सुन्नत + 2 फ़र्ज़
- ज़ुहर: 4 सुन्नत + 4 फ़र्ज़ + 2 सुन्नत
- अस्र: 4 सुन्नत + 4 फ़र्ज़
- मग़रिब: 3 फ़र्ज़ + 2 सुन्नत
- इशा: 4 सुन्नत + 4 फ़र्ज़ + 2 सुन्नत + 3 वितर
जामा नमाज़ — भारतीय तरीक़ा
भारत की अधिकांश मस्जिदें हनफ़ी फ़िकह पर चलती हैं — ज़ुहर, अस्र और इशा में इमाम खामोश रहता है, मुसल्ली ज़ोर से क़िराअत करता है। जामा नमाज़ की फ़ज़ीलत अकेले पढ़ने से सत्ताईस गुना ज़्यादा है — इसलिए मोहल्ला मस्जिद जाना आम है।
नमाज़ मोमिन पर मुकरّर वक़्तों में फ़र्ज़ है।